दसवीं से उन्नीसवीं सदी तक लद्दाख एक स्वतंत्र राज्य था. यहां 30-32 राजाओं का इतिहास रहा है. लेकिन 1834 में डोगरा सेनापति ज़ोरावर सिंह ने
लद्दाख पर विजय प्राप्त की और यह जम्मू-कश्मीर के अधीन चला गया.
इसलिए
लद्दाख अपनी स्वतंत्र पहचान को लेकर मुखर रहा है. यहां यूटी की मांग दशकों
पुरानी है. लेकिन साल 1989 में इस मांग को कुछ सफलता मिली, जब यहां
बौद्धों के प्रभावशाली धार्मिक संगठन लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन (एलबीए) की
अगुवाई में बड़े स्तर पर आंदोलन हुआ.
राजीव गांधी की सरकार इस पर बात करने को तैयार हुई. यूटी का दर्ज़ा तो नहीं मिला लेकिन बाद में 1993 में केंद्र और प्रदेश सरकार लद्दाख को स्वायत्त हिल काउंसिल का दर्ज़ा देने को तैयार हो गईं.
इस काउंसिल के
पास ग्राम पंचायतों के साथ मिलकर आर्थिक विकास, सेहत, शिक्षा, ज़मीन के
उपयोग, टैक्सेशन और स्थानीय शासन से जुड़े फ़ैसले लेने का अधिकार है जबकि
लॉ एंड ऑर्डर, न्याय व्यवस्था, संचार और उच्च शिक्षा से जुड़े फ़ैसले जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए ही सुरक्षित रखे गए.
यानी एक तरह से कुछ
क्षेत्रों में लद्दाख को थोड़ी स्वायत्तता ज़रूर मिली और उसके बाद कई
स्तरों पर यहां विकास की रफ़्तार में भी इज़ाफ़ा हुआ.
लोगों को उम्मीद है कि विकास की ये रफ़्तार और बढ़ेगी जब स्थानीय मूल के एक उपराज्यपाल अपने मुख्य सचिव के साथ लेह या कारगिल में बैठेंगे. उन्हें
यहां के समाज की बेहतर समझ होगी और वो केंद्र में उनके सच्चे प्रतिनिधि
होंगे.
दोरजे नामग्याल वरिष्ठ नागरिक हैं और लेह के मुख्य बाज़ार में उनकी कपड़ों की दुकान है. वो मानते हैं कि सरकार के फ़ैसले से फ़ायदा और नुक़सान
दोनों होगा.
वो कहते हैं, "फ़ायदा ये है कि यहां रोज़गार बढ़ेगा
लेकिन नुक़सान ये है कि ख़र्च बढ़ेगा, किराया बढ़ेगा और आबादी बाहर से आएगी तो बाज़ार और रोज़गार की स्पर्धा बढ़ेगी."
वह कहते हैं कि अभी ठीक
से किसी को पता नहीं है कि यह फ़ैसला आगे चलकर क्या रूप लेगा. लेकिन चूंकि
यूटी एक पुरानी मांग थी तो उसके पूरे होने पर लोग ख़ुश हैं लेकिन बहुत जानकारी किसी को नहीं है. अंतत: बात ज़मीन बचाने पर आ सिमटी है.
लेकिन जश्न और ख़ुशी के इस माहौल में लोगों की कुछ
अस्पष्टताएं और चिंताएं भी नत्थी हैं जिनका ज़िक्र किए बिना बात अधूरी
रहेगी. दिलचस्प बात ये है कि ये चिंताएं उन अधिकारों के संरक्षण से जुड़ी
हैं, जो लद्दाख के लोगों को अनुच्छेद 370 के तहत ही मिलते थे.
370 के तहत बाहर के लोगों को यहां ज़मीन ख़रीदने की इजाज़त नहीं थी जो यहां के कारोबारी हितों का एक बड़ा 'सेफ़गार्ड' था.
अब यहां के होटल कारोबारी, दुकानदार और टैक्सी मालिक ख़ुशी तो ज़ाहिर करते हैं, पर लगे हाथ ये भी कहते हैं कि उनके कारोबारी हितों की रक्षा के
लिए सरकार वैसे ही प्रावधान लाए जैसे पूर्वोत्तर भारत, हिमाचल प्रदेश और
कुछ अन्य राज्यों में हैं. यानी 370 जैसा ही कुछ.
लेह के होटल
असोसिएशन के अध्यक्ष त्सेवांग यांगजोर मानते हैं कि अगर अनुच्छेद 370 हटाए
बिना लद्दाख को अलग यूटी बना दिया जाता तो यहां की बेहतरी के लिए अच्छा
होता.
वो कहते हैं, "ऐसा होता तो हमारे कारोबारी हितों के लिए ज़रूर अच्छा होता. मैं कह नहीं सकता पर शायद सरकार की कुछ राजनीतिक दिक्क़तें
रही होंगी."
यह भी साफ़ नहीं है कि उन स्वायत्त हिल काउंसिल्स का होगा, जिसने एक क़िस्म का लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण किया था.
स्थानीय
पत्रकार सेवांग रिंगज़िन यूटी आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं. वो कहते हैं कि यहां के लोग दशकों से यूटी की मांग कर रहे हैं लेकिन उनकी यूटी की
परिकल्पना में विधानसभा की विदाई शामिल नहीं थी.
वो कहते हैं, "हिल
काउंसिल मिलने के बाद तो जम्मू-कश्मीर स्टेट का ज़ुल्म ज़्यादा नहीं रह गया
था. बीते 10-15 साल से 'यूटी विद विधानसभा' की मांग ही रही है. "
एक
चिंता पर्यावरण को लेकर भी है. रिंगज़िन कहते हैं, "अब लद्दाख एक लोकप्रिय
पर्यटक स्थल बन चुका है. यहां का पर्यावरण काफ़ी नाज़ुक है जिसे लेकर लोग काफ़ी संवेदनशील हैं. ऐसा न हो कि बाहर से बड़ी आबादी के आने से कहीं
लद्दाख की पहचान ख़त्म न हो जाए."
पी. स्तोबदान इसे एक विशेष उपमा देते हैं. वो कहते हैं, "आटे में नमक
मिले तो चलता है लेकिन नमक में आटा मिलेगा तो नमक का वजूद ख़त्म हो जाएगा. हमें भरोसा है कि सरकार हमें एक गर्म तवे से हटाकर, दूसरे गर्म तवे पर नहीं
पटकेगी."
विधानसभा न मिलने से लद्दाख चंडीगढ़ जैसा केंद्र शासित प्रदेश होगा, दिल्ली जैसा नहीं. हिल काउंसिल की भूमिका को लेकर
अनिश्चितताओं के मद्देनज़र स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल भी हैं.
लेह
के रहने वाले रियाज़ अहमद केंद्र सरकार का शुक्रिया कहते हुए यह भी कहते
हैं कि हिल काउंसिल्स की ताक़त बनाए रखी जाए और हो सके तो यहां विधानसभा भी
दी जाए.
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